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      Home Editorial

      Social Media and Press Laws in India: Misuse, Causes, Impacts, and Remedies

      by Dr. Arvind Kumar Singh
      3 months ago
      in Editorial
      0

      Social Media and Press Laws in India सोशल मीडिया पर भारत में प्रेस कानून का पालन: दुरुपयोग, कारण, प्रभाव और निवारण

      (Social Media and Press Laws in India: Misuse, Causes, Impacts, and Remedies)

               आज का युग सूचना क्रांति का युग है, जहाँ तकनीक ने संवाद और विचारों की अभिव्यक्ति के पारंपरिक रूप को पूरी तरह बदल दिया है। भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में, जहाँ नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार के रूप में प्राप्त है, सोशल मीडिया इस स्वतंत्रता का सबसे सशक्त और लोकतांत्रिक मंच बन चुका है। फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर), व्हाट्सएप, टेलीग्राम आदि प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से आज हर नागरिक एक “जनसंचारक” बन गया है। पहले समाचार केवल अख़बारों और टीवी चैनलों के माध्यम से प्रसारित होते थे, लेकिन अब हर व्यक्ति अपने विचारों, अनुभवों और मतों को सीधे लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है।

             हालाँकि, यह स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब इसके साथ जिम्मेदारी और नैतिकता का संतुलन बना रहे। संविधान ने अनुच्छेद 19(1)(a) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, लेकिन साथ ही अनुच्छेद 19(2) में स्पष्ट कर दिया गया है कि यह स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है — इसे राष्ट्र की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, मानहानि, शालीनता और नैतिकता की मर्यादाओं में रहकर प्रयोग किया जाना चाहिए। दुर्भाग्यवश, आज सोशल मीडिया के मंचों पर इस स्वतंत्रता का उपयोग अक्सर अराजक, अनियंत्रित और कानून-विरोधी रूप में देखने को मिलता है। फेक न्यूज़, घृणास्पद भाषण, अश्लीलता, मानहानि और अफवाहें अब सामान्य होती जा रही हैं। इस अनियंत्रित प्रवृत्ति ने प्रेस कानूनों के मूल उद्देश्यों को चुनौती दी है। अतः यह आवश्यक है कि हम गहराई से समझें — भारत में प्रेस कानूनों की क्या स्थिति है, सोशल मीडिया पर उनका पालन क्यों नहीं हो पाता, इसका समाज और लोकतंत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है, और इसके निवारण के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं।

      2. भारत में प्रेस कानूनों का उद्देश्य (Purpose and Nature of Press Laws)

      भारत में प्रेस कानूनों का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा है। ब्रिटिश शासन ने प्रेस पर नियंत्रण के लिए कई कानून बनाए, लेकिन स्वतंत्र भारत में इन्हीं कानूनों को नागरिक अधिकारों की रक्षा और मीडिया की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिए पुनर्गठित किया गया। इनका मुख्य उद्देश्य है — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखते हुए, समाज और राष्ट्र की गरिमा बनाए रखना।

      प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स एक्ट, 1867 के अनुसार, किसी भी प्रकाशन की जिम्मेदारी उसके संपादक और प्रकाशक की होती है। यह कानून पारदर्शिता और जवाबदेही स्थापित करता है। कॉपीराइट एक्ट, 1957 यह सुनिश्चित करता है कि किसी की बौद्धिक संपत्ति का दुरुपयोग न हो। आईटी एक्ट, 2000 डिजिटल मीडिया में अश्लीलता, साइबर अपराध, और फेक न्यूज़ से निपटने का प्रावधान करता है। मानहानि से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 499–502 व्यक्ति की प्रतिष्ठा की रक्षा करती है। वहीं इंडिसेंट रिप्रेजेंटेशन ऑफ वीमेन (प्रोहिबिशन) एक्ट, 1986 महिलाओं के सम्मानजनक चित्रण को सुनिश्चित करता है। इन सभी कानूनों की भावना यही है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग जनहित, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ किया जाए। लेकिन जब यही कानून सोशल मीडिया पर लागू होते हैं, तो यह स्पष्ट दिखता है कि वहां इनकी अनदेखी आम बात है। लाखों यूज़र्स को न तो इन कानूनों की जानकारी है, न वे जानते हैं कि कोई भी पोस्ट या वीडियो कानूनी दृष्टि से किस सीमा तक वैध है। इसलिए कानून होने के बावजूद उनका अनुपालन व्यावहारिक रूप से कमजोर बना हुआ है।

       3. सोशल मीडिया पर प्रेस कानूनों का पालन : वर्तमान स्थिति

             भारत में लगभग 85 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं और इनमें से लगभग 70 करोड़ लोग किसी न किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हैं। हर मिनट लाखों ट्वीट, पोस्ट, और वीडियो अपलोड होते हैं। यह मात्रा इतनी विशाल है कि प्रशासनिक निगरानी लगभग असंभव बन जाती है। मुख्य समस्या यह है कि सोशल मीडिया “यूज़र-जनरेटेड कंटेंट” पर आधारित है। पारंपरिक मीडिया में संपादकीय जांच और कानूनी टीम होती है, जो हर सामग्री को सत्यापित करती है, लेकिन सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति स्वयं प्रकाशक बन गया है। इस कारण वहां प्रकाशित सामग्री की सत्यता या वैधता का कोई ठोस नियंत्रण नहीं रह जाता। इसके परिणामस्वरूप, फेक न्यूज, अफवाहें, भड़काऊ पोस्ट और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ तेजी से फैलती हैं। जैसे —

      • 2020 में दिल्ली दंगों के दौरान सोशल मीडिया पर कई झूठे वीडियो वायरल हुए, जिन्होंने हिंसा को भड़काया।
      • 2021 में किसानों के आंदोलन के समय कई विदेशी तस्वीरों को भारत का बताकर भ्रामक प्रचार किया गया।

      हालांकि सरकार ने आईटी नियम 2021 के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को जवाबदेह बनाने का प्रयास किया है, लेकिन कंपनियाँ अक्सर “फ्री स्पीच” के नाम पर अपनी जिम्मेदारी से बचती हैं। परिणामस्वरूप, सोशल मीडिया आज स्वतंत्रता और अराजकता के बीच की एक पतली रेखा पर खड़ा है।

       4. सोशल मीडिया के दुरुपयोग के प्रमुख कारण (Major Causes of Misuse)

      सोशल मीडिया का दुरुपयोग एक बहुआयामी समस्या है, जिसके सामाजिक, तकनीकी और मनोवैज्ञानिक कारण हैं।

      (क) प्रौद्योगिकी की सहज उपलब्धता:
       आज इंटरनेट और स्मार्टफोन हर व्यक्ति की पहुँच में है। कोई भी व्यक्ति कुछ ही सेकंड में फोटो, वीडियो या विचार पोस्ट कर सकता है। यह आसान पहुँच लोकतंत्र का प्रतीक है, परंतु इसी के कारण बिना जिम्मेदारी और ज्ञान के पोस्टिंग की प्रवृत्ति बढ़ी है।

      (ख) तथ्य-जांच की कमी:
      परंपरागत मीडिया में समाचार प्रकाशित करने से पहले उसकी कई स्तरों पर जांच होती थी। लेकिन सोशल मीडिया पर लोग बिना सत्यापन के “ब्रेकिंग न्यूज” पोस्ट कर देते हैं। इससे झूठी खबरें तेजी से फैलती हैं।

      (ग) राजनीतिक ध्रुवीकरण:
      राजनीतिक दल और उनके समर्थक सोशल मीडिया को प्रचार और विरोधी मतों को दबाने के उपकरण के रूप में प्रयोग करते हैं। इससे प्लेटफॉर्म “संवाद का मंच” न रहकर “प्रचार का युद्धक्षेत्र” बन जाता है।

      (घ) लोकप्रियता की लालसा:
      “वायरल” होने की चाहत ने लोगों को सनसनीखेज, विवादास्पद और भड़काऊ सामग्री पोस्ट करने की प्रवृत्ति दी है।

      (ङ) कानूनी जागरूकता का अभाव:
      अधिकांश उपयोगकर्ताओं को यह नहीं पता कि ऑनलाइन पोस्ट भी मानहानि, कॉपीराइट, और आईटी कानूनों के दायरे में आते हैं।

      (च) निगरानी की सीमाएँ:
      सरकारी एजेंसियाँ केवल उन्हीं मामलों में कार्रवाई कर पाती हैं जो वायरल या शिकायत-योग्य बनते हैं। इससे छोटे लेकिन हानिकारक पोस्ट अनदेखे रह जाते हैं। इस प्रकार, सोशल मीडिया के दुरुपयोग की जड़ जिम्मेदारी की कमी और निगरानी की असंभवता में निहित है।

       5. सोशल मीडिया के दुरुपयोग के प्रभाव

      सोशल मीडिया का प्रभाव समाज, राजनीति, संस्कृति और मानसिकता — सभी स्तरों पर दिखाई देता है।

      (क) सामाजिक प्रभाव:

      सोशल मीडिया ने एक ओर जनसंपर्क को लोकतांत्रिक बनाया, वहीं दूसरी ओर समाज को विभाजित भी किया। फेक न्यूज और अफवाहें सांप्रदायिक तनाव फैलाती हैं। उदाहरण के लिए, 2018 में व्हाट्सएप अफवाहों के कारण कई निर्दोष लोगों की मॉब लिंचिंग हुई। झूठी खबरें लोगों की भावनाओं को भड़काकर समाज में हिंसा फैलाती हैं।

      मानहानि और निजी आक्षेप भी गंभीर समस्या बन गए हैं। किसी व्यक्ति के खिलाफ झूठी पोस्ट या मॉर्फ्ड फोटो उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नष्ट कर देते हैं। महिलाओं के विरुद्ध साइबर ट्रोलिंग और अश्लील टिप्पणी ने सोशल मीडिया को असुरक्षित बना दिया है।

      (ख) राजनीतिक प्रभाव:

      राजनीतिक दलों ने सोशल मीडिया को प्रचार के हथियार के रूप में अपनाया है। इससे चुनावी प्रक्रिया पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। झूठे आंकड़े, ट्रेंडेड हैशटैग और ट्रोल आर्मी जनमत को प्रभावित करते हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों में हजारों फेक प्रोफाइल्स का उपयोग कर राजनीतिक संदेशों को प्रचारित किया गया।

      (ग) सांस्कृतिक प्रभाव:

      सोशल मीडिया ने मनोरंजन और संस्कृति के स्वरूप को बदल दिया है। परंतु अनियंत्रित उपयोग से अश्लीलता, फूहड़पन और संवेदनहीनता बढ़ी है। दुखद घटनाओं को “मीम” बनाकर प्रस्तुत करना आम बात हो गई है।

      (घ) मानसिक प्रभाव:

      लगातार नकारात्मक समाचार, घृणास्पद टिप्पणियाँ और तुलना की संस्कृति ने लोगों में तनाव, अवसाद और आत्ममुग्धता को जन्म दिया है। साइबर बुलिंग के कारण कई युवाओं ने आत्महत्या तक कर ली। इन प्रभावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग न केवल कानून तोड़ता है, बल्कि समाज की मानसिक संरचना को भी क्षति पहुँचाता है। Social Media and Press Laws in India

       6. प्रेस कानूनों के उल्लंघन के उदाहरण (Examples of Violations)

      भारत में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ सोशल मीडिया ने प्रेस कानूनों का उल्लंघन किया।

      • डीपफेक तकनीक से बनाए गए वीडियो में राजनीतिक नेताओं या अभिनेताओं को गलत संदर्भ में दिखाया गया।
      • कई फेक न्यूज वेबसाइटें बिना स्रोत बताए अफवाहें फैलाती हैं।
      • कॉपीराइट उल्लंघन — यूट्यूब या इंस्टाग्राम पर दूसरों के संगीत या वीडियो का बिना अनुमति उपयोग।
      • हेट स्पीच और मानहानि — किसी धर्म, जाति या व्यक्ति के खिलाफ भड़काऊ भाषा का प्रयोग।
      • अश्लील सामग्री — महिलाओं के अपमानजनक चित्रण से समाज में विकृति फैलाना।

      इन घटनाओं से स्पष्ट है कि सोशल मीडिया का उपयोग बिना कानूनी अनुशासन के, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अराजकता का रूप दे रहा है।

      7. निवारण के उपाय (Remedial Measures)

      इस समस्या के समाधान के लिए सरकार, नागरिक, मीडिया और तकनीकी संस्थानों को सामूहिक रूप से कार्य करना होगा।

      (क) कानूनी सुदृढ़ीकरण:

      आईटी (Intermediary Guidelines) नियम, 2021 को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। फेक न्यूज फैलाने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भारत में नियुक्त उनका “ग्रेवेंस ऑफिसर” शिकायतों का 24 घंटे में जवाब दे।

      (ख) डिजिटल साक्षरता:

      जनता को यह सिखाना आवश्यक है कि कौन-सी सूचना सही है, कौन-सी झूठी। स्कूलों और कॉलेजों में मीडिया साक्षरता को विषय के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।

      (ग) स्वनियमन:

      जैसे प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया प्रिंट मीडिया की निगरानी करता है, उसी प्रकार एक “डिजिटल कंटेंट अथॉरिटी” बनाई जाए। सोशल मीडिया कंपनियाँ अपने समुदाय दिशानिर्देशों का पालन कठोरता से कराएँ।

      (घ) तकनीकी उपाय:

      एआई आधारित सिस्टम से हेट स्पीच, फेक न्यूज, और अश्लील कंटेंट की स्वतः पहचान की जा सकती है। डीपफेक पहचान तकनीक का विकास और उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए।

      (ङ) सामाजिक जिम्मेदारी:

      हर नागरिक को यह समझना चाहिए कि अभिव्यक्ति स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य भी है। किसी भी पोस्ट से पहले यह सोचना जरूरी है कि उसका समाज पर क्या असर पड़ेगा।

      8. समाज, सरकार और मीडिया की साझा भूमिका (Collective Responsibility)

      सोशल मीडिया के दुरुपयोग की रोकथाम केवल सरकार का कार्य नहीं है; यह साझी जिम्मेदारी है।

      • सरकार को कानूनों के साथ-साथ पारदर्शी शिकायत तंत्र बनाना चाहिए।
      • सोशल मीडिया कंपनियाँ अपने एल्गोरिद्म को पारदर्शी बनाएँ और फेक न्यूज के खिलाफ नीति तय करें।
      • मीडिया संस्थान तथ्य आधारित रिपोर्टिंग और नैतिक पत्रकारिता को प्रोत्साहित करें।
      • नागरिक समाज डिजिटल नैतिकता को अपनाए और गलत सूचनाओं की पहचान करे।

      एक जिम्मेदार डिजिटल संस्कृति तभी विकसित हो सकती है जब समाज “स्वतंत्रता” के साथ “अनुशासन” का पालन करे।

       निष्कर्ष (Conclusion)

      सोशल मीडिया आज जनसंचार का सबसे प्रभावशाली और लोकतांत्रिक माध्यम है। लेकिन इसकी शक्ति तभी सकारात्मक बन सकती है जब इसमें नैतिकता, सत्यता और कानून की मर्यादा बनी रहे। भारत के प्रेस कानून नागरिकों की अभिव्यक्ति को सीमित नहीं करते, बल्कि उसकी गरिमा और सामाजिक उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करते हैं। यदि हम सोशल मीडिया पर इन सिद्धांतों का पालन करें — तो यह लोकतंत्र की सबसे सशक्त आवाज़ बन सकता है। लेकिन यदि इसका दुरुपयोग जारी रहा, तो यही माध्यम फूट, घृणा और अविश्वास का कारण बन जाएगा। अतः समय की मांग है कि प्रत्येक नागरिक यह समझे —

      “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तभी सार्थक है, जब वह जिम्मेदारी और मर्यादा के साथ हो।” Social Media and Press Laws in India

      Media Studies

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