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      How to Speak on an Unfamiliar Subjectअनजान विषय पर कैसे बोले ?

      by Dr. Arvind Kumar Singh
      6 days ago
      in Communication, Media Study Material
      0
      How to speak on an Unfamiliar Subject अनजान विषय पर कैसे बोले ?

      How to Speak on an Unfamiliar Subject कई बार ऐसा होता है कि किसी कार्यक्रम, संगोष्ठी या व्याख्यान सत्र में किसी व्यक्ति को अध्यक्षता करनी पड़ती है, जबकि वह उस विषय का विशेषज्ञ नहीं होता। यह स्थिति किसी भी विश्वविद्यालय, महाविद्यालय या संस्था में आम है, क्योंकि पद के कारण व्यक्ति को कार्यक्रम का अध्यक्ष बनाया जाता है, न कि विषय के कारण। यह अपेक्षा करना कि कोई भी अध्यक्ष हर विषय का ज्ञाता होगा, न तो व्यावहारिक है और न ही संभव। परंतु यहीं से एक कठिन चुनौती प्रारंभ होती है—अनजान विषय पर बोलना और वह भी गरिमा, संतुलन और समझदारी के साथ।

      अनेक बार देखा गया है कि जब अध्यक्ष विषय से अपरिचित होता है, तो मंच पर बोलते समय वह असहज महसूस करता है। कुछ लोग इस असहजता को छिपाने के लिए अनावश्यक ढंग से बोलने लगते हैं, जबकि कुछ अपने सीमित ज्ञान को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। यही वह क्षण होता है जहाँ उनकी वास्तविक स्थिति उजागर हो जाती है। श्रोता भले ही तत्काल टोका-टोकी न करें, परंतु मन ही मन वे अध्यक्ष के प्रति अपनी धारणा बना लेते हैं। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि अनजान विषय पर बोलते समय व्यक्ति अपनी सीमाओं को पहचाने और उसी के अनुसार अपनी भूमिका तय करे। How to Speak on an Unfamiliar Subject https://www.youtube.com/watch?v=hxdqvyWBNiQ

      सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अध्यक्ष को उस विषय की गहराई में दखल देने से बचना चाहिए, जिसके बारे में उसे स्वयं स्पष्ट समझ न हो। मंच पर बैठकर यह दिखावा करना कि वह विषय का पूर्ण ज्ञाता है, न केवल कार्यक्रम की गरिमा को ठेस पहुँचाता है बल्कि स्वयं उसकी विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगा देता है। इसके विपरीत यदि वह ईमानदारी के साथ यह स्वीकार कर ले कि यह उसका क्षेत्र नहीं है, तो लोग उसके प्रति अधिक सम्मान और सहानुभूति का भाव रखते हैं। यह स्वीकारोक्ति कमजोरी नहीं बल्कि परिपक्वता और आत्मविश्वास का प्रतीक होती है। How to Speak on an Unfamiliar Subject

      दूसरा महत्वपूर्ण तरीका यह है कि अध्यक्ष कार्यक्रम से पहले विषय से संबंधित लोगों से संक्षिप्त जानकारी प्राप्त कर ले। यदि संभव हो तो आयोजकों से एक छोटा सा लिखित विवरण या भाषण तैयार करवा लिया जाए। यह विवरण विषय का सार, उद्देश्य और प्रमुख बिंदुओं को समझने में सहायक होता है। इससे अध्यक्ष मंच पर बोलते समय पूरी तरह खाली हाथ नहीं रहता और उसे कम से कम इतना पता होता है कि संगोष्ठी का मूल स्वरूप क्या है। परंतु यहाँ भी यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि जो कुछ वह कह रहा है, वह विषय विशेषज्ञों की जानकारी के आधार पर है, न कि उसके अपने गहन अध्ययन का परिणाम।

      एक और व्यावहारिक तरीका यह है कि अध्यक्ष अपने व्यक्तिगत अनुभवों को विषय से जोड़ने का प्रयास करे, लेकिन बहुत सतर्कता के साथ। अनुभव साझा करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वह विषय से पूरी तरह असंबंधित न हों और न ही विषय को हल्के में लेने की स्थिति उत्पन्न करें। कई बार अध्यक्ष अपने अनुभवों के नाम पर मंच को ऐसे मोड़ देते हैं कि संगोष्ठी का मूल उद्देश्य ही पीछे छूट जाता है। इससे विशेषज्ञ वक्ता स्वयं को उपेक्षित महसूस करते हैं और कार्यक्रम की गंभीरता प्रभावित होती है।

      यह भी अत्यंत आवश्यक है कि अध्यक्ष अनजान विषय पर लंबा भाषण देने से बचे। जैसे ही कोई व्यक्ति उस विषय पर अधिक बोलने लगता है, जिसकी उसे पूर्ण जानकारी नहीं होती, उसकी सीमाएँ स्वतः उजागर होने लगती हैं। श्रोता तत्काल कुछ न कहें, परंतु वे यह अवश्य महसूस करते हैं कि अध्यक्ष विषय से भटक रहा है। इसलिए संक्षिप्त, संयमित और संतुलित बोलना ही सर्वोत्तम उपाय है। “कम बोलो, सही बोलो” का सिद्धांत यहाँ पूरी तरह लागू होता है।

      अध्यक्ष के लिए यह भी उपयोगी होता है कि वह मंच पर विषय विशेषज्ञों के प्रति सम्मान और उत्सुकता व्यक्त करे। वह यह कह सकता है कि वह स्वयं इस विषय को सीखने और समझने की इच्छा रखता है तथा आज यहाँ उपस्थित होकर वह स्वयं भी एक श्रोता के रूप में बहुत कुछ ग्रहण करने को उत्सुक है। ऐसा कहने से उसकी भूमिका मार्गदर्शक से अधिक एक संवेदनशील सहभागी की हो जाती है, जिससे वातावरण सहज और सकारात्मक बनता है।

      कई बार व्यक्ति पदेन अध्यक्ष होता है, अर्थात् उसका चयन विषयगत योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि पद के कारण किया जाता है। ऐसी स्थिति में यह भूल नहीं करनी चाहिए कि मंच पर बैठना यह अधिकार नहीं देता कि वह कार्यक्रम को अपनी इच्छानुसार किसी भी दिशा में मोड़ दे। यदि संगोष्ठी का विषय गंभीर है, तो अध्यक्ष को उसके अनुरूप ही अपनी भाषा और शैली को बनाए रखना चाहिए। किसी भी प्रकार की हल्की-फुल्की टिप्पणी, असंबंधित मज़ाक या विषय से भटकाने वाली बातें कार्यक्रम की गंभीरता को कमजोर कर देती हैं।

      आज के समय में यह और भी महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि सूचना और जाँच के साधन हर व्यक्ति के हाथ में हैं। लोग तुरंत तुलना कर लेते हैं, तथ्यों की जाँच कर सकते हैं और यह समझने में देर नहीं लगती कि कौन कितना जानता है। इसलिए केवल पद या मंच के आधार पर अपनी बात को सही मान लेने का युग अब समाप्त हो चुका है। अध्यक्ष के रूप में बोलते समय यह समझ होना चाहिए कि उसकी बातों को श्रोता न केवल सुन रहे हैं बल्कि परख भी रहे हैं। Importance of Intro in Speech भाषण के आरंभिक शब्दों का महत्व

      अतः समग्र रूप से यही कहा जा सकता है कि अनजान विषय पर बोलते समय सबसे सुरक्षित और सम्मानजनक मार्ग ईमानदारी, संक्षिप्तता और विनम्रता का होता है। यदि बोलने की इच्छा प्रबल हो तो पहले स्वयं अध्ययन करें, विशेषज्ञों से परामर्श लें और फिर स्पष्ट कर दें कि यह आपका विषय नहीं है, बल्कि आप सीखने की प्रक्रिया में हैं। यही दृष्टिकोण कार्यक्रम की गरिमा को भी सुरक्षित रखता है और अध्यक्ष की प्रतिष्ठा को भी।

      अंततः यह समझना आवश्यक है कि अध्यक्षता का अर्थ मंच पर सबसे अधिक बोलना नहीं होता, बल्कि मंच पर उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान देना, कार्यक्रम के उद्देश्य को बनाए रखना और स्वयं को विषय के अनुरूप ढालना होता है। जो अध्यक्ष यह समझ लेता है कि अनजान विषय पर कितना और कैसे बोलना है, वही वास्तव में अपनी भूमिका को गरिमा और परिपक्वता के साथ निभा पाता है।

      How to Speak on an Unfamiliar Subject

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