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      Central board of film certification CBFC

      by Dr. Arvind Kumar Singh
      4 months ago
      in Media Law, Media Study Material
      0
      Central board of film certification CBFC

      Central board of film certification earlier known as film censor board certifies film in India. This article throws light on its functioning.

      केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) Central board of film certification CBFC

      कुछ फिल्मों को ले करके उनके निर्माण के समय से ही किसी न किसी ढंग के विवाद होते रहते है। इस विवाद के दौरान सेन्सर बोर्ड नाम का भी जिक्र होता है। लोगों की एक बहुत ही स्वाभाविक उत्सुकता होती है कि यह फिल्म सेन्सर बोर्ड क्या है और यह कैसे कार्य करता है। आगे इसी के बारे में चर्चा किया गया है।

      फिल्म सेंसर बोर्ड का वास्तविक नाम केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड(सीबीएफसी) है। पहले इसका नाम फिल्म सेन्सर बोर्ड ही रहा है। यह सूचना और प्रसारण मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय है। इसे सिनेमैटोग्राफ अधिनियम 1952 के प्रावधानों के तहत फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन को रेगुलेट करता है जिससे कि फिल्मों का निर्माण कानून के दायरे में हो। अर्थात् उसमें दिखाये एवं सुनाये जाने वाली बातें भारत के संविधान में नागरिकों को जो अधिकार दिये गये हैं, उसके दायरे में ही हो। इसमें ऐसा कुछ भी न प्रस्तुत किया जाये जो कि संविधान में वाक् एवं अभिव्यक्ति के अधिकार का उल्लंघन करता दिखे। किसी भी फिल्म के निर्माण के बाद केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा प्रमाणित होने पर ही फिल्मों को भारत में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जा सकता है।

      बोर्ड का स्वरूप structure of Central board of film certification

      फिल्म बोर्ड का अपना एक स्वरूप है। इसमें गैर- आधिकारिक सदस्य और एक अध्यक्ष होता है। ये सभी केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त होते है। इन्हे केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त करती है। इसका मुख्यालय मुंबई में है। इसके नौ क्षेत्रीय कार्यालय हैं। मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बैंगलोर, तिरुवनंतपुरम, हैदराबाद, नई दिल्ली, कटक और गुवाहाटी शहर में है। क्षेत्रीय कार्यालयों को सलाहकार पैनलों द्वारा किसी भी निर्मित फिल्म की जांच में सहायता प्रदान की जाती है। पैनल के सदस्यों को 2 साल की अवधि के लिए होती है। इस बोर्ड में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से लोगों को केंद्र सरकार द्वारा नामित किया जाता है।

      बोर्ड का विजन एवं मिशन Vision and mission Central board of film certification CBFC

      सिनेमैटोग्राफ अधिनियम 1952 और सिनेमैटोग्राफ (प्रमाणन) नियम 1983 के प्रावधानों के अनुसार अच्छा और स्वस्थ मनोरंजन सुनिश्चित करना बोर्ड का विजन है। इसके मिशन के अन्तर्गत जो बातें शामिल हैं, उसमें जनता को स्वस्थ मनोरंजन और शिक्षा सुनिश्चित करना, फिल्म प्रदर्शन हेतु प्रमाण देने की प्रक्रिया को पारदर्शी और जिम्मेदार बनाना है। इसी के साथ कार्यशालाओं और बैठकों के माध्यम से सलाहकार पैनल के सदस्यों, मीडिया और फिल्म निर्माताओं के बीच प्रमाणन के दिशा निर्देशों और फिल्मों में वर्तमान प्रवृत्ति के बारे में जागरूकता पैदा करना भी इसका विजन है।


      इसी प्रकार से प्रमाणन प्रक्रिया के कम्प्यूटरीकरण और बुनियादी ढांचे के उन्नयन के माध्यम से प्रमाणन प्रक्रिया के लिए आधुनिक तकनीक को अपनाना भी इसका मिशन है। स्वैच्छिक प्रकटीकरण, ई-गवर्नेंस के कार्यान्वयन भी इसके मिशन में शामिल किया गया में है । आरटीआई प्रश्नों के यथाशीघ्र जवाब और वार्षिक रिपोर्ट के प्रकाशन के माध्यम से बोर्ड की गतिविधियों के बारे में पारदर्शिता बनाए रखना भी इसका मिशन है। सेन्ट्रल बोर्ड आफ फिल्म सर्टिफिकेशन अर्थात् सीबीएफसी को उत्कृष्टता केंद्र के रूप में विकसित करना एक अन्य मिशन है।

      फिल्मों का प्रमाणन एवं श्रेणी Central film certification board

      प्रमाणन प्रक्रिया सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952, सिनेमैटोग्राफ (प्रमाणन) नियम, 1983 और केंद्र सरकार द्वारा धारा 5 (बी) के तहत जारी दिशानिर्देशों के अनुसार है। बोर्ड प्रत्येक फिल्म को चार श्रेणियों में से एक में रखता है। अप्रतिबंधित सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए यू U, केवल वयस्कों के लिए ए A , 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए माता-पिता के मार्गदर्शन की आवश्यकता वाली फिल्मों के लिए यूए UA, और सीमित दर्शकों के लिए प्रदर्शन के लिए एस S प्रमाण दिया जाता है। किन्तु सरकार द्वारा अब इसमें संशोधन करके इस श्रेणी में बदलाव किया गया है।

      TV Anchor

      जब कभी भी किसी प्रकार के फिल्म का निर्माण होता है तो फिर उसकी फिल्म सेन्सर बोर्ड किसी फिल्म के सर्टिफिकेट देने में कई प्रकार की बातों को ध्यान में रखता है। असामाजिक गतिविधियों जैसे हिंसा, अन्धविश्वास का महिमामंडन नहीं किया जा सकता है। आपराधिक कार्यो का चित्रण नहीं किया जा सकता है। किसी फिल्म में निम्नलिखित प्रकार के दृश्य एवं श्रव्य सामग्री पर रोक है जिसमें कि –

      • हिंसक कृत्यों या दुर्व्यवहार में बच्चों की भागीदारी दिख रहा है।
      • शारीरिक या मानसिक रूप से विकलांगों के साथ दुर्व्यवहार या उपहास किया जा रहा है।
      • जानवरों के प्रति क्रूरता का अनावश्यक चित्रण किया जा रहा हो।
      • अकारण हिंसा, क्रूरता, या आतंक को दर्शाया जा रहा हो।
      • शराब सेवन, नशीली दवाओं की लत या धूम्रपान को प्रोत्साहित करने वाला कोई दृश्य हो
      • यौन हिंसा सहित कोई भी अश्लीलता, भ्रष्टता, दोहरे अर्थ वाले या महिलाओं को अपमानित करने वाले दृश्य हो।
      • जाति, धर्म या अन्य सामाजिक समूह द्वारा कोई अपमान हो रहा हो।
      • सांप्रदायिक, रूढ़िवादी, वैज्ञानिक-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी दृष्टिकोण को बढ़ावा दे रहा हो।
      • भारत देश का विदेशों से रिश्ते प्रभावित हो रहे हो।
      • प्रतीक और नाम (अनुचित उपयोग की रोकथाम) अधिनियम, 1950 (1950 का 12) के अनुसार छोड़कर, कोई राष्ट्रीय प्रतीक या प्रतीक का उपयोग किया जा रहा हो।

      इस प्रकार से यह स्पष्ट है कि किसी फिल्म के निर्माण के दौरान इस बात के पर्याप्त प्रावधान किये गये है कि फिल्म के माध्यम से किसी भी प्रकार का कोई ऐसी सामग्री न प्रस्तुत हो जो कि समाल देश का किसी न किसी प्रकार से नुकसान करता हो।

      सिनेमैटोग्राफ अधिनियम के उल्लंघन पर सजा –

      प्रमाणन प्रावधानों के उल्लंघन से संबंधित अपराध संज्ञेय अपराध के अन्तर्गत आता है जो कि गैर-जमानती हैं। इस अधिनियम की धारा 7 सेंसरशिप प्रावधानों के उल्लंघन के लिए दंड का प्रावधान करती है। इस अधिनियम की धारा 6ए का अनुपालन करने में विफलता के लिए जुर्माना भी लगाया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि किसी प्रदर्शक या वितरक को फिल्म वितरित करने वाला कोई भी व्यक्ति उसे सभी कट्स, प्रमाणन, शीर्षक, लंबाई और प्रमाणन की शर्तों का विवरण भी देगा।

      सेल्युलाइड फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान उल्लंघन का दोषी व्यक्ति को तीन साल तक की कैद या 1 लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों से दंडित किया जा सकता है। किन्तु इस प्रकार का अपराध कई बार निरन्तर किया जाता है । इस स्थिति में निरंतर अपराध हेतु प्रत्येक दिन के लिए 20,000 रु जुर्माने का प्रावधान है। इस धारा में निर्धारित तरीके से नियमों का उल्लंघन करने वाली वीडियो फिल्में दिखाने पर कम से कम तीन महीने की कैद का प्रावधान किया गया है। इसे तीन साल तक बढ़ाया जा सकता है। जुर्माना कम से कम 20,000 रुपये का है। लेकिन इसे भी बढ़ाया जा सकता है।


      जुर्माने के सन्दर्भ में यह भी प्रावधान है कि लगातार करने पर यह 1 लाख रुपये हो सकता है। फिर प्रत्येक दिन के लिए 20,000 रुपये तक का अतिरिक्त जुर्माना किया जा सकता है। इसके अलावा, ट्रायल न्यायालय यह निर्देश दे सकता है कि आपत्तिजनक फिल्म को सरकार को जब्त कर लिया जाए। इसी प्रकार से धारा 7ए के तहत, कोई भी पुलिस अधिकारी उस थियेटर हॉल में प्रवेश कर सकता है, जहॉं कोई ऐसी फिल्म दिखायी जा रही होती है जो कि आपत्तिजनक होती है।

      किन्तु सरकार द्वारा कुछ दिनों पूर्व केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के कानून में संशोधन किसी प्रकार के उल्लंघन पर सजा के प्रावधान में बदलाव किये गये हैं।

      इसे पढ़े कैसे – बचें डीप फेक समाचार के प्रभाव से

      पढ़े – सरकार द्वारा केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड में संशोधन-2023

      इसी प्रकार से वह उस परिसर की तलाशी ले सकता है और प्रदर्शित की जाने वाली फिल्म की प्रिंट जब्त किया जा सकता है। सिनेमैटोग्राफ अधिनियम के उल्लंघन होने की आशंका होने पर भी फिल्मों को जब्त किया जा सकता है। इस प्रकार से सिनेमेटोग्राफ ऐक्ट के अन्तर्गत सिनेमा माध्यम का सही ढंग से उपयोग किये जाने के सन्दर्भ में विविध प्रकार के प्रावधान किये गये हैं।

      https://www.cbfcindia.gov.in/cbfcAdmin/

      इस प्रकार फिल्म निर्माण में दिखाये जाने वाले दृश्य एवं संवाद सही ढंग से प्रस्तुत करने के संन्दर्भ में केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा कई प्रकार से प्रावधान किये गये हैं। किन्तु इसके बावजूद फिल्मों को ले करके विविध प्रकार के विवाद होते रहते है। इसके कारणों का अध्ययन किये जाने की आवश्यकता है।

      https://www.bhaskar.com/news/ENT-BNE-about-censor-board-and-its-process-4714972-PHO.html

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      Dr. Arvind Kumar Singh

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