Cultivation Theory of Communication जॉर्ज गर्बनर की ‘कल्टीवेशन थ्योरी
Cultivation Theory of Communication (Introduction)
संचार के क्षेत्र में जॉर्ज गर्बनर (George Gerbner) का नाम एक अत्यंत प्रभावशाली सिद्धांतकार के रूप में लिया जाता है। उनका Cultivation Theory यह समझाने का प्रयास करता है कि मीडिया विशेष रूप से टेलीविज़न या आज के डिजिटल माध्यम लोगों के मन, विचार और व्यवहार को समय के साथ कैसे बदल देते हैं।
गर्बनर का मानना था कि —
“मीडिया केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि वह हमारी वास्तविकता की समझ को भी गढ़ता है।”
इस सिद्धांत के अनुसार, जो कुछ हम बार-बार मीडिया पर देखते हैं, उसे हम धीरे-धीरे ‘वास्तविकता’ मानने लगते हैं, चाहे वह सच्चाई से कितना ही दूर क्यों न हो। Uses and Gratifications Theory
अर्थ (Meaning of Cultivation Theory)
‘Cultivation’ शब्द का अर्थ होता है संवर्धन या विकास। गर्बनर ने इसे इस रूप में प्रयोग किया कि मीडिया दर्शकों के मन में धीरे-धीरे एक दृष्टिकोण, विश्वास या विश्वदृष्टि (worldview) विकसित करता है।
वे कहते हैं कि बार-बार दिखाया गया कोई चित्र, धारणा या विचार अंततः दर्शक के मन में वास्तविकता के रूप में स्थिर हो जाता है।
उदाहरण: यदि कोई व्यक्ति हर दिन टीवी या YouTube पर अपराध से भरे समाचार या सीरीज़ देखता है, तो वह यह सोचने लगता है कि “दुनिया बहुत असुरक्षित है।” भले ही वास्तविक अपराध दर उतनी न हो, लेकिन उसके मन में यह धारणा बन जाती है — यही “कल्टीवेशन इफ़ेक्ट” है।
इतिहास और विकास (History and Development)
इस सिद्धांत की शुरुआत 1960 के दशक में हुई, जब टेलीविज़न अमेरिका में अत्यधिक लोकप्रिय हो रहा था। जॉर्ज गर्बनर ने “Cultural Indicators Project” नामक अध्ययन शुरू किया, जिसमें उन्होंने वर्षों तक यह शोध किया कि टीवी पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रम समाज के लोगों के दृष्टिकोण पर क्या असर डालते हैं। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि “Television cultivates the perception of reality.”
गर्बनर और उनके सहयोगी लैरी ग्रॉस (Larry Gross) ने यह भी कहा कि लगातार हिंसक कार्यक्रम देखने वाले लोग “Mean World Syndrome” का शिकार हो जाते हैं।
मुख्य अवधारणाएँ (Key Concepts) Cultivation Theory of Communication
Mainstreaming (मुख्यधारा प्रभाव)
मीडिया सभी वर्गों, जातियों और पृष्ठभूमियों के लोगों को एक साझा विश्वदृष्टि में ढाल देता है।
→ उदाहरण: भारत में लगभग सभी लोग समाचार चैनलों के माध्यम से यह मानने लगे हैं कि राजनीति में भ्रष्टाचार सर्वव्यापी है, चाहे वास्तविकता अलग हो।
Resonance (अनुनाद प्रभाव)जब दर्शक के निजी अनुभव और मीडिया में दिखाए गए अनुभव एक जैसे होते हैं, तो मीडिया का प्रभाव और गहरा हो जाता है।
→ उदाहरण: अगर कोई व्यक्ति शहर में रहता है जहाँ अपराध अधिक है और वह अपराध पर आधारित वेब सीरीज़ देखता है, तो वह और भी अधिक भयभीत हो जाता है।
Mean World Syndrome (डर की दुनिया का भ्रम)
यह वह स्थिति है जब लगातार हिंसक समाचार या धारावाहिक देखने से व्यक्ति यह मानने लगता है कि दुनिया बहुत खतरनाक है और कोई सुरक्षित नहीं है।
सिद्धांत का महत्व (Importance of the Theory)
- मीडिया प्रभावों को गहराई से समझना:
यह सिद्धांत हमें यह समझने में मदद करता है कि मीडिया केवल मनोरंजन नहीं बल्कि विचारों का संवाहक है। - सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से उपयोगी:
यह दर्शाता है कि कैसे मीडिया धीरे-धीरे हमारे भय, विश्वास और नैतिक मूल्यों को प्रभावित करता है। - संस्कृति के निर्माण में मीडिया की भूमिका:
टेलीविज़न या आज के सोशल मीडिया समाज की साझा सोच को बनाता है। - नीतिगत अध्ययन में सहायता:
कई मीडिया नियामक संस्थाएं इस सिद्धांत के आधार पर तय करती हैं कि हिंसा या अश्लीलता पर नियंत्रण कैसे लगाया जाए। गुण (Merits or Strengths) - दीर्घकालिक प्रभाव की पहचान:
यह सिद्धांत यह बताता है कि मीडिया का असर धीरे-धीरे और गहराई से होता है, जो अन्य सिद्धांतों से अलग दृष्टिकोण है। - समाज के सामूहिक दृष्टिकोण को समझना:
यह केवल व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे समाज के दृष्टिकोण पर मीडिया के प्रभाव को दिखाता है। - प्रायोगिक शोध पर आधारित:
गर्बनर का अध्ययन वर्षों के डेटा और विश्लेषण पर आधारित था, जिससे यह विश्वसनीय सिद्धांत बन गया। - डिजिटल युग में भी प्रासंगिक:
आज के YouTube और सोशल मीडिया में जो चीज़ें बार-बार दिखाई जाती हैं, वे समाज की सोच को उसी प्रकार प्रभावित करती हैं। सीमाएँ (Demerits or Criticisms) - सभी दर्शकों को समान मानना:
यह मान लेना कि हर व्यक्ति समान रूप से प्रभावित होगा, एक त्रुटि है। शिक्षा, अनुभव और आलोचनात्मक सोच से प्रभाव बदलता है। - नई मीडिया तकनीक की अनदेखी:
यह सिद्धांत टेलीविज़न के युग में बना था, जबकि आज का मीडिया ‘इंटरएक्टिव’ (सहभागी) है। - सामग्री की विविधता को नज़रअंदाज़ करना:
अब मीडिया पर मनोरंजन, शिक्षा, प्रेरणा और विज्ञान जैसे अनेक प्रकार की सामग्री होती है, जो अलग-अलग प्रभाव डालती है। - दर्शक की सक्रियता को नकारना:
आधुनिक संचार सिद्धांत जैसे ‘Uses and Gratification’ कहते हैं कि दर्शक सक्रिय होता है, जबकि गर्बनर का सिद्धांत उसे निष्क्रिय मानता है। वर्तमान संदर्भ में कल्टीवेशन थ्योरी (Relevance in Modern Digital Era)
आज के दौर में जब सोशल मीडिया, OTT प्लेटफ़ॉर्म और डिजिटल न्यूज़ चैनल हर समय हमारी आंखों के सामने हैं, तो Cultivation Theory पहले से अधिक प्रासंगिक हो गई है।
अब “टेलीविज़न की जगह” मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है — लेकिन प्रभाव वही है, बल्कि कहीं अधिक गहरा भी दिखता है। - सोशल मीडिया पर आदर्श जीवन का भ्रम:
Instagram या YouTube पर ‘Influencers’ अपनी ज़िंदगी का सिर्फ़ सबसे सुंदर हिस्सा दिखाते हैं।
दर्शक धीरे-धीरे मानने लगते हैं कि सफलता, सुंदरता और लोकप्रियता ही जीवन का लक्ष्य है। यह digital cultivation का आधुनिक रूप है।
- राजनीतिक ध्रुवीकरण (Political Polarization):
जब कोई व्यक्ति बार-बार किसी एक विचारधारा या दल के YouTube चैनल देखता है, तो वह उसी विचारधारा में ढल जाता है।
यह ‘Mainstreaming’ का नया रूप है — लेकिन अब यह algorithm-driven है।
- भय और असुरक्षा की भावना:
लगातार अपराध और दंगों से जुड़े वीडियो देखने वाले लोग यह सोचने लगते हैं कि “देश बहुत खतरनाक है।”
यह आज का “Mean World Syndrome” है, जो मीडिया द्वारा ‘डर की खेती’ करता है।
- उपभोक्तावाद का संवर्धन:
हर दिन हम सैकड़ों विज्ञापन देखते हैं जो हमें बताते हैं कि “खुशी वस्तुओं में है।”
दर्शक धीरे-धीरे मानने लगता है कि “ब्रांडेड वस्तुएँ ही जीवन का मूल्य हैं।”
यह भी एक प्रकार का Cultivation Effect है।
- OTT प्लेटफॉर्म और हिंसा का प्रभाव:
वेब सीरीज़ में अत्यधिक हिंसा, गाली-गलौज और अपराध को ‘नॉर्मल’ दिखाया जाता है।युवा दर्शक मानने लगते हैं कि यह सब “रोज़मर्रा की वास्तविकता” है — समाज में असंवेदनशीलता बढ़ने लगती है।
- Fake News और Propaganda का संवर्धन:
लगातार झूठी या अतिरंजित ख़बरें देखने से लोग उसे सत्य मान लेते हैं।
यह डिजिटल युग का नया “Cultivation Effect” है, जहाँ repetition creates belief।
- भारतीय संदर्भ में महत्व (Relevance in Indian Society)
भारत जैसे विविध और विशाल देश में यह सिद्धांत कई रूपों में दिखाई देता है —
- धार्मिक या जातिगत धारणा का प्रसार:
कुछ टीवी चैनलों या YouTube कंटेंट के लगातार एक ही दृष्टिकोण प्रस्तुत करने से समाज में bias या prejudice मजबूत होते हैं। - महिलाओं की छवि:
धारावाहिकों में महिलाओं को अक्सर पारंपरिक या नकारात्मक रूप में दिखाया जाता है। इससे समाज में महिलाओं के प्रति रूढ़ धारणाएँ “संवर्धित” होती हैं। - राष्ट्रीयता और आदर्शवाद का प्रचार:
देशभक्ति आधारित कार्यक्रमों से एक सकारात्मक cultivation भी होता है, जिससे लोगों में राष्ट्रप्रेम और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है। शैक्षणिक और सामाजिक उपयोगिता (Practical and Academic Usefulness)
मीडिया स्टडीज़ में यह सिद्धांत यह समझने के लिए प्रयोग किया जाता है कि बार-बार दिखाई जाने वाली सामग्री समाज में कौन से सामाजिक पैटर्न बनाती है। मनोविज्ञान में इसे “Perception Management” के रूप में समझाया जाता है।
शिक्षा और नीति निर्माण में इसका प्रयोग मीडिया साक्षरता (Media Literacy) बढ़ाने के लिए किया जाता है ताकि लोग मीडिया संदेशों को आलोचनात्मक दृष्टि से देखें।
निष्कर्ष (Conclusion)
जॉर्ज गर्बनर की Cultivation Theory आज भी उतनी ही सार्थक है जितनी 1960 के दशक में थी, बल्कि अब यह और भी आवश्यक हो गई है। माध्यम बदल गए हैं — टेलीविज़न से लेकर स्मार्टफ़ोन तक — लेकिन मीडिया का प्रभाव अब और अधिक गहरा, व्यक्तिगत और सर्वव्यापी हो चुका है।
यह सिद्धांत हमें यह चेतावनी देता है कि —
“हम वही बन जाते हैं, जो हम लगातार देखते हैं।”
इसलिए आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है मीडिया साक्षरता (Media Literacy) और आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking)।
हमें यह समझना होगा कि हर सूचना, हर दृश्य और हर वीडियो हमें किसी दिशा में ढाल रहा है — और हमें तय करना है कि हम कौन-सी सोच का संवर्धन (Cultivation) अपने भीतर करना चाहते हैं।
संक्षिप्त सारांश (Quick Summary Table)
बिंदु विवरण
प्रवर्तक -जॉर्ज गर्बनर
दशक -1960s
माध्यम- टेलीविज़न (अब सोशल मीडिया)
मुख्य अवधारणा- मीडिया दर्शकों की वास्तविकता की धारणा को गढ़ता है
प्रमुख शब्द Mainstreaming, Resonance, Mean World Syndrome
प्रभाव -भय, दृष्टिकोण, विश्वास और सामाजिक सोच का निर्माण
आधुनिक उदाहरण -YouTube, Instagram, OTT, Fake News
वर्तमान महत्व- डिजिटल कंटेंट के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को समझना
Cultivation Theory of Communication